मानव जीवन में सुख और दुःख की पराकाष्ठा से गुजरना पड़ता है : निजानंद शास्त्री

लोकपति सिंह की रिपोर्ट :

सैदूपुर : मानव जीवन में सुख और दुःख की पराकाष्ठा से गुजरना पड़ता है। सुख के वक्त अत्यधिक उतावला नहीं होना चाहिए। और दुःख के वक्त घबराना नहीं चाहिए। संत का साथ मनुष्य को यदि मिल जाए तो उसके सारे विपत्तियों का हरण हो जाता है। उक्त बातें मानस प्रेम यज्ञ सेवा समिति खरौझा के तत्वावधान में राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय सरैया बसाढ़ी के प्रांगण में चल रहे श्री रामकथा की पांचवी निशा पर कथावाचक पंडित निजानंद शास्त्री ने राम कथा का वृतांत सुनाते हुए कही।



उन्होंने कहा कि प्रभु श्री राम और माता सीता के विवाह के उपरांत जब प्रभु को 14 वर्ष का वनवास मिला तो अयोध्या नगरी में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। मगर विपत्ति के वक्त भरत जी जैसे संत ने अयोध्या नगरी को संभाला।और प्रभु श्रीराम खड़ाऊ को सिंहासन पर रखकर उनके ही नाम से 14 वर्ष तक राज्य को धैर्य पूर्वक चलाया। कथा वाचक कहते हैं कि विपत्ति में भरत जैसे संत का साथ जिसे मिल जाए तो उसके ऊपर चाहे कितने भी बड़े गम का पहाड़ क्यू न टूटा हो वह धैर्य पूर्वक दुखों व्यतीत कर लेगा। इसलिए मानव जीवन में संतों की संगति होना जरूरी है।रामचरितमानस मनुष्य को जीने की कला सिखाती है। जो इसका श्रवण करता है। उसका जीवन दुखों से दूर हो जाता है। और वह आनंद अलौकिक जीवन व्यतीत करता है। कथा में विश्वनाथ द्विवेदी, जय प्रकाश शर्मा, राजेश सिंह, अरुण श्रीवास्तव, ओम प्रकाश, पुनम पाण्डेय, उमाशंकर मौर्य, त्रिवेणी दूब, जयप्रकाश, पूनम पांडेय, माधुरी शर्मा आदि श्रोता उपस्थित थे ।


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